Wednesday, 31 December 2025

अलविदा 2025

अलविदा 2025,
इतिहास, बन जाओगे, कल तुम भी, 
सिमट जाओगे, उन पन्नों में,
फिर, समीक्षाओं में ही, नजर आओगे!

कितने ही सपनों के, संग जिए तुम,
असंख्य नैनों में, दिखे तुम,
कभी चूमे, सफलताओं के शिखर,
कभी, विफलताओं से गुजरे,
कभी, सुखद एहसासों के आंगन,
कभी, दुखद पलों ने सींचे दामन,
देकर, ऐसे कितने ही क्षण,
आज, गुज़र जाओगे,
सिमट जाओगे, उन नैनों में,
अंकित, उन तस्वीरों में उभर आओगे!

अलविदा 2025,
कल, तुम भी, इतिहास बन जाओगे....

अंत, अवश्यंभावी, हर पल प्रभावी,
क्षण वही, आज पुनः हावी,
इस मानस में, अंकित हो जाओगे,
पुनः, यादों में, उभर आओगे,
शुक्रिया, पल जितने भी दिए तूने,
कल जितने भी, संग जिए हमने,
वो हर क्षण, स्वीकार हमें,
हर पल अंगीकार,
आत्मसात रहोगे, मानस में,
शायद, विवेचनाओं में, उभर आओगे!

अलविदा 2025,
इतिहास, बन जाओगे, कल तुम भी,
सिमट जाओगे, उन पन्नों में,
फिर, समीक्षाओं में ही, नजर आओगे!

Sunday, 28 December 2025

असहज वर्ष

शायद, न होगा दुखों का अंत, इस बसंत!

यूं, दर्द-ए-दस्तान, हो गई है मुकम्मिल,
सितम उन पतझड़ों के, इस कदर हैं शामिल,
बे-असर रह गए, मौसमों के मरहम,
सिल चुके, ये, दो होंठ प्यासे,
कुछ, यूं, टूटा है मन!

शायद, न होगा दुखों का अंत....

कह कर गुजर गई, इस वर्ष ये पवन,
अबकी खिल न पाएंगे, इन शाखों पर चमन,
खेले हैं पतझड़ों ने, कुछ खेल ऐसे,
सूखे है डाल, बिखरे हैं पात,
टूटा, ये, अंतःकरण!

शायद, न होगा दुखों का अंत....

बहा ले गई, सब रंग, इक बयार ही,
खबर ही न थी, वक्त लूटेगा माँ का प्यार भी,
दे पाएगी क्या, बसंत की ये बयार,
छेड़ेगी, बस, व्यथा के तार,
और, दुखाएगी मन!

शायद, न होगा दुखों का अंत....

वर्ष के कगार, टूटा इक और तार,
लूटा वक्त ने, असमय, प्रिय अनुज का प्यार,
मंद-मंद थी चली, कैसी ये बयार,
असहज से हुए ये मौसम,
दुखी, ये अंतःकरण!

शायद, न होगा दुखों का अंत, इस बसंत!

Thursday, 18 December 2025

दुश्वार ये क्षण मुक्कू

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

वक्त, ज्यूँ गया है थम,
संग जो बीते, यूं तो, वो वक्त थे कम, 
तेरे अकस्मात, जाने का ग़म,
गुजरा हो जैसे, क्षण में इक जीवन,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

यूं, क्षणिक ये दुनियां,
सुना था, क्षण में गिरती हैं बिजलियां,
क्षण में, उजड़ती हैं बस्तियां, 
यूं संग, अब मेरे ही, खेल गई क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

विछोह, यही असह्य,
यूं बिखर गई, अपनी जगह से हर शै,
मुक्कू, तुम क्यूं बिछड़ गए,
क्यूं पड़ गए, कम जिंदगी के क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

स्नेह भरा, मुख तेरा,
याद बहुत आयेगा, स्नेहिल सा चेहरा,
संग तुम्हारे, जो पल गुजरा,
छोड़ गए पीछे, कुछ यादों के क्षण,
भ्राता मेरे, तुम यूं आए, 
यूं गए...

दुश्वार बड़ा ये क्षण! मुक्कू, तुम यूं आए, 
यूं गए...

Sunday, 14 December 2025

पूर्वज

वो, आसमां पे रब हुए.....

करुण स्वर, जिनके, कर जाते थे सहज,
पूर्वज मेरे, जिनके, हम हैं वंशज,
वो, आसमां पे रब हुए, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

देकर आशीर्वचन, चल पड़े वो इक डगर,
दिया जन्म जिसने, अब वो ही नहीं इस घर,
तस्वीर, उनकी, बस रह गयी, इस नजर,
गूंजते, अब भी उनके मधुर स्वर,
ओझल नैन से वो, पर, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

मन की क्षितिज पर, रमते अब भी वही,
छलक उठते, ये नयन, जब भी बढ़ती नमी,
यूं तो, घेरे लोग कितने, पर है इक कमी,
संग, उनकी दुवाओं का, असर,
वो हैं, इक नूर शब के, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

उनके एहसान का, चुकाऊं उधार कैसे,
दी जो विरासत, उनका, रख लूं मान कैसे,
यूं ही होने दूं, पूर्वजों का अपमान कैसे,
ये कर्ज, हम पर, युग-युगांतर,
सर्वथा, इस ऋण से उबार कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

उन पूर्वजों को, हम, करते नित नमन,
तस्वीर वो ही, बसती मेरे मन,
वो, आसमां पे रब हुए, दूर कब हुए!

वो, आसमां पे रब हुए.....

Sunday, 7 December 2025

धुंधली लकीरें

तैरती नींद में, धुंधली सी, लकीरें,
फिर उभर आई, वही भूली सी तस्वीरें!

अधर उनके, फिर, छंद कई लिखती गई,
यूं कहीं, अधख़िली सी, चंद कली खिलती गई,
सिमट आए, ख्वाब सारे, बंद पलकों तले,
उभरती रहीं, नींद में, तैरती लकीरें!

शक्ल वो ही पहचानी, लेती रही आकार,
यूं, बंद पलकों तले, धुंधले से, स्वप्न थे साकार,
फिर, धागे वो ही, मोह के स्वतः बंध चले,
ले चली किधर, उभरती वो तस्वीरें!

घिरा अंकपाश में, न कोई आस-पास में,
जड़वत देखता रहा, मैं उनको ही अंकपाश में,
गुजारी पल में सदियां, उस छांव के तले,
बहला गई, नींद में, उभरती लकीरें!

टूटा वो दिवास्वप्न, टूटे सब वो झूठे भ्रम,
ढ़ाए थे नींद ने, दिल पे, बरबस, सैकड़ों सितम,
ख्वाब सारे, बिखर गए, इन पलकों तले,
उभर कर, बिखर गई, तैरती लकीरें!

शुक्रिया करम, नींद के ओ मीठे से भ्रम, 
वहम ही सही, पल भर, जीवन्त कर गए तुम,
ग़म से कोसों दूर, हम कहीं, संग थे चले, 
छल गई भले, धुंधली सी वो लकीरें!

खुली आंख, बहती स्वप्न की नदी कहां!
ग़म से बोझिल पल बिना, बीतती सदी कहां!
पड़ जाती यहां, दिन में, छाले पावों तले,
गर्म सी रेत पर, बनती कहां लकीरें! 

तैरती नींद में, धुंधली सी, लकीरें,
उभर आई फिर, वही भूली सी तस्वीरें!

Friday, 28 November 2025

बिछड़ी पात

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

प्रलय ले आई, छम-छम करती बूंदें,
गीत, कर उठे थे नाद,
डाली से, अधूरी थी हर संवाद,
बस, बह चली वो पात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

मौसम ने दी थी, फीकी सी सौगात,
ठंड पड़े, सारे जज्बात,
छूटी पीछे, रिश्तों की गर्माहट,
करती भी क्या, वो पात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

हंसते वो मौसम, ले आए कैसे ग़म,
सर्वथा, खाली थे दामन,
यूं सर्वदा के लिए, टूटा था मन,
बेरंग, कर गई बरसात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

यूं हंसी किसी की, बन जाए अट्टहास,
आस ही, कर दे निराश,
सर्वथा, अपना भी ना हो पास,
पल दिन के, लगे रात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

मौसम तो भर ही जाएंगे, डाली के ग़म,
वृष्टि ही, लगाएगी मरहम,
समाहित, कर जाएगी हर ग़म
इसी सृष्टि में, हर बात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

दास्तां, इक पल की, बन चला पात,
रहा, भीतर एक उन्माद,
इक सफर अधूरी, डाली से दूरी,
पिघलती, इक जज़्बात!

भीगे से पल में......, 
बिछड़ चली, इक डाली से पात,
निर्मम, कैसी ये बरसात!

Tuesday, 25 November 2025

32 वर्ष

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....

वर्षों, सम्मोहित करते रहे, तेरे बुने सरसों,
प्रफुल्लित करते रहे, मुझे, उन फूलों सा स्पर्श, 
आकर्षित करते रहे, सरसों सा फर्श,
यूं, कटे संग-संग 32 वर्ष,
ज्यूं, संग चले, तुम कल परसों!

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....

कुछ है कारण, बादल बन आए ये सावन,
रंगों का सम्मोहन, भीगे मौसम के आकर्षण,
खिलते, अगहन में पीले-पीले सरसों,
भीगे, फागुन की आहट,
चाहत के, ये अनगिन रंग वर्षों!

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....

यूं इन रेखाओं में, मुकम्मल सी तुम हो,
जितना पाया, शायद, अब तक वो कम हो!
शेष बचा जो, वो हर पल हो विशेष,
चल, बुनें फिर से सरसों, 
संग, उसी राह, चले फिर वर्षो!

हां, समाहित हो तुम, यूं मुझमें ही वर्षों....


Celebrating 32nd years of togetherness at Chennai on 24.11.2025