Wednesday, 13 January 2016

अधूरा स्वप्न

बिखरे थे राहों में कुछ फूलों जैसे शय,
दुर्दशा देख द्रवित हो रूंध उठा हृदय,
हुई विह्वल आँखें मन को बांधु तो कैसे,
भाव प्रवण दामन मे समेट लिया ऐसे।

बसा लिया उस फूल को फिर हमने,
हृदय के अन्दर सुदूर कोने में कहीं,
महसूस हुआ स्पर्श उन फूलों सा ही,
व्यथा उसके मन की है अब मेरी ही।

भ्रम टूटा जब चुभन काँटो की हुई,
उसकी भी अपनी कोई आपबीती,
भूत के गर्त से निकल समक्ष आई,
सपन मृदु टूटे आँखे विह्वल हो आईं।

मृदुलता के कुछ क्षण साथ हमने थे बाँटे,
चुपके से दामन मे चुभ गए थे कुछ काँटे,
संशय भ्रम उन स्वप्नों के पर अब हैं छूटे,
क्या हुआ जब दिल किसी बात पर टूटे।

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